Monday, January 02, 2017

जैसी संगत वैसी बरकत

मुलायम सिंह जीवन भर मुसलमान जपते रहे। सत्ता तक पहुंचने के लिए उन्होने इनकी संगति की। हिन्दू मान्यता है कि जैसी संगति वैसी बरकत।
तुलसीदास भी लिखते हैं
जहां सुमति तहं सम्पति नाना
जहां कुमति तहं विपति निधाना।।
--- अब नीचे दिए संदर्भ को पढ़ने से मंतव्य स्पष्ट होगा। राजनीतिक जीवन में मुगल/मुस्लिम की विचारधारा मानने पालने का परिणाम यह है कि खुद का बेटा सत्ता से बेदखल कर दिया।

*****
सियासत में कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं.
मुग़लों के दौर में बाप को सत्ता से हटाने के लिए बेटे न केवल बग़ावत पर उतर आते थे, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर राजधानी पर चढ़ाई भी कर देते थे.
जहांगीर ने अक़बर से बग़ावत की. जहांगीर से शाहजहां ने विद्रोह किया और शाहजहां से औरंगज़ेब ने. समय के पहियों को और पीछे ले जाएं तो रोमन साम्राज्य में भी सत्ता के लिए संघर्ष होता रहा.

इन दिनों उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में जारी पारिवारिक घमासान भी मुग़लों की याद दिलाता है. पार्टी में बाप से बेटे की बग़ावत, पार्टी के अंदर साज़िश और एक दूसरे के खिलाफ़ षड्‍यंत्र से मुग़ल साम्राज्य की बू आती है.

Friday, August 26, 2016

पत्रकार और खूंटा

पत्रकार और खूँटा
चर्चाओं से कुछ हासिल होने वाला नहीं। जिसे मिले वह फायदा उठाए। सबकी चिंता में कुछ नहीं मिलेगा। पत्रकारिता अब सिद्धांतों पर चलने वाली नहीं रही। पत्रकार ऐसी बिरादरी है कि अगर आप अपनी मेहनत से भी कुछ पा रहे होंगे और इन्हें पता चल जाए तो पूरी शिद्दत से लग जाएंगे ताकि आप का बनता काम बिगड़ जाए, नुकसान हो जाए। एक साथ बैठे काम करने वाले लोग कब अनायास आपकी कुर्सी खींच दें पता नहीं। कुटिलता से सहानुभूति भी दिखाएँगे और आप पर हंसतेे भी रहेंगे । यह मानसिकता जब होगी तो कौन किसी और के लिए सोचेगा? इसलिए बहुत समाजसेवा की सोचने की जगह अपने अपने फायदे वाले खूंटे खोज कर मजबूती से थाम लीजिए। यही काम आएगा। नहीं तो इसी तरह ग्रुप पर चर्चा ही करते रह जाएंगे सब।
...पंकज सिंह की खरी खरी।

Friday, January 04, 2013

तो इसमें गलत क्या है

तो इसमें गलत क्‍या है

बस यही सवाल मैंने पूछ लिया तो वह नाराज हो गई।
तुम मेरे चरिञ पर शक करते हो।
मैं इसके आगे कुछ बोल नहीं सका, अब जबाव से क्‍या सवाल किया जाए।
आज कुल कितने दिन हुए उससे मिले। कुल नौ-दस महीने।नहीं 28 फरवरी, शाम को अचानक उसका फोन आया। तेज और सपाट आवाज, जी आपके नम्‍बर से कॉल आई थी। मैंने कहा आप कौन। तो मैं आवाक एक दिवास्‍वप्‍न सा महसूस कर रहा था। शाम का वह वक्‍त व्‍यस्‍तता के बाद भी बात खत्‍म करने का मन नहीं कर रहा था। कुछ औपचारिक सा परिचय और ऐसा लगा जैसे हम एक दूसरे को न जाने कब से जानते हैं। बात होती रही, मन की आस बढती रही। वक्‍त की बंदिशें थीं, लेकिन फिर मिलने का वादा कर वह खुशनुमा सी शाम आगे बढी। न काम में मन लगा, न खाने में। रात गुजरी, सुबह हुई। जहां से उसे रोज देखते थे आज वह जगह और अच्‍छी लग रही थी। क्‍योंकि आज यह पता था कि मेरे देखने का जवाब आ रहा है। बातों, बातों से आगे मुलाकातें, और फिर मोहब्‍बत का एक सिलसिला।
कौन है। शायद मेरा रुम पार्टनर आ गया था। दरवाजे पर दस्‍तक हुई तो हकीकत के सपनों से बाहर निकला।

Sunday, June 12, 2011

गुम स्‍याही सी वर्तमान कांग्रेस

वर्तमान कांग्रेस पार्टी मूल कांग्रेस की एक ऐसी फोटोकापी है जिसमें लिखे शब्‍दों की स्‍याही उड चुकी है। लेकिन कांग्रेसी इस नाम को भुनाने की कोशिश में लगे हैं। महात्‍मा गांधी को कांग्रेसी अपनी निजी मिल्कियत समझते हैं लेकिन इतिहास कहता है कि गांधी जी ने 1939 में कांग्रेस को छोड दिया था। इसके पीछे उनका तर्क था कि 1937 के चुनावों में कांग्रेस सरकार में शामिल हो गई है। इसलिए अब यह एक राजनीतिक पार्टी बन चुकी है, यह अब वह कांग्रेस नहीं जो एक आंदोलन के तौर पर शुरु की गई थी। कांग्रेस ने यहां अपना स्‍वरुप थोडा बदला। इसके बाद आजादी मिली तो नेहरु की कांग्रेस का जन्‍म हुआ। कांग्रेस की सरकार। जो एकमाञ पार्टी होने के चलते शासन में आ गई। लेकिन कांग्रेस तब टूटी जब 1969 के दौरान इं‍दिरा गांधी ने इसे अपनी निजी पार्टी बना ली। के कामराज के अध्‍यक्ष पद जीतने के बाद कांग्रेस आई का गठन हुआ। जो आज भी चला आ रहा है। पार्टी के स्‍वरुप में 1990 के दशक में बदलाव आया। जब सोनिया गांधी को प्रधानमंञी बनाने और न बनाने पर चाटुकारिता शुरु हुई। देश और भारतीयता से अनभिज्ञ सोनिया ने अपनी कमियों को छुपाने के लिए पद लेना स्‍वीकार नहीं किया जिसे पार्टी ने उनकी त्‍याग भावना बताकर प्रचारित किया।
पार्टी अब केवल एक व्‍यक्ति की पार्टी होकर रह गई है।मनमोहन देश के प्रधानमंञी हो सकते हैं लेकिन कभी सोनिया से उपर नहीं। पार्टी राष्‍ट्रपति या प्रधानमंञी तय कर सकती है, लेकिन सत्‍ता की कमान उस एक तंञ में रहेगी।जो वंशानुगत चल रही है। जबकि मूल कांग्रेस में गांधी जी ने इसका हमेशा विरोध किया कि कांग्रेस आंदोलन या पार्टी किसी एक व्‍यक्ति या उसके संरक्षण में संचालित हो। तो क्‍या कांग्रेस उस मूल कांग्रेस की एक ऐसी फोटोकापी रह गई है जिसपर से वक्‍त ने स्‍याही धुंधली कर दी हो।

Saturday, October 23, 2010

फिर आओ 'हे राम'


वर्तमान में, आम जन मानस के लिये विकट परिस्थितियां हैं। अब यह आवश्यक हो गया है कि एक बार फिर राम का अभ्युदय हो। जो जनमानस को व्यस्था के विरूद्ध खडा कर सके। आंतकी रूपी राक्षसी प्रवृत्तियां अपने चरम की ओर वढ रहीं हैं और राजनैतिक दल रूपी देव शक्तियां अपने निजी स्वार्थों के चलते उनका विरोध नहीं कर पा रहीं हैं। पूजींपति व्यवस्था आम आदमी का खून चूसने को तैयार हैं। समाज में व्याप्त भ्रष्‍टाचार, लोलुपता और वैमन्यस्यता की स्थिति विस्फोटक हो गयी है। सत्ता अब उदंड एवं उच्छृंखल हो चुकी है। जो केवल अपने स्वार्थों की पूर्ती का साधन भर रह गयी है। सत्ता का मद किसी मान्यता और मूल्यों नहीं पहचाने दे रहा है। बन्धुओं-परिजनों को भी धन और लाभ ने परस्पर शत्रुता की आग में झोक दिया है।
जब सत्ता कमजोर या स्वार्थी हो जाती है तो हमेशा शोषण पनपता है। शासन की पूरी शक्ति अपने व्यक्तिगत विलास में ही समाप्त हो रही है। आम आदमी शोषित हो रहा है लेकिन अपनी प्रवृतियों के चलते चाहते हुये भी विरोध नही कर सकता क्योंकि वह संगठित नहीं है। जिससे उसे लड़ना है वह एक संगठित एवं व्यवस्थित तंत्र है। उसने धन सम्पदा और जीवन की अन्य आवश्यकताओं को अपने अधिकार में कर रखा है। व्यवस्था पर उनके अधिकार के चलते वे जब चाहें जैसे चाहें एक आम इंसान को शोषित कर रहे हैं। सबसे बडी बात कि शोषण भी ऐसा कि हमारे द्वारा ही हमारा शोषण कर लिया जा रहा है। हमारे हितों का झूठा संदर्भ दिखा कर हमारे धन और श्रम का उपयोग कर वे अमीर से अमीर होते चले गये और श्रमशील जन सामान्य शोषित एवं पीडित।
हम यह समझ पाने में सक्षम नहीं हैं कि हमारा शोषण किस प्रकार किया जा रहा है। व्यवस्थाओं को इतना दुरूह बना दिया गया है कि वे आम आदमी को संचालित होते तो दिख रही हैं लेकिन कैसे संचालित हो रहीं हैं और उसमें उसको कितना लाभ और हानि हो रही है, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।
लेकिन अब जगना होगा। इन व्यवस्थाओं से लड़ कर ही एक समता मूलक समाज तैयार किया जा सकता है। एक राम को फिर आकर इन्हे संगठित एंव संघर्ष के लिये तैयार करना होगा। राक्षस वृत्तियों से मुक्ति तभी होगी जब हम सामूहिक लडाई के लिये तैयार हों। जन सामन्य को प्रत्येक कदम पर लडना होगा और सदैव संघर्ष के लिये तैयार भी रहना होगा

Monday, August 30, 2010

भटकते-भटकते

भटकते-भटकते कभी तो मिलेगी
वो रुठी हुई दिलरुबा जिंदगानी
वो जिसके लिए हमने सपने सजाए
वो जिस पे लुटा दी है सारी जवानी
भटकते-भटकते
आंखों से तेरे भी बहने लगेगा
जज्‍बात का वो खारा सा पानी
कभी तुमको छू के सिहरती हवाएं
सुनाएंगी जब मेरे गम की कहानी
भटकते-भटकते

Thursday, June 17, 2010

हम-तुम मिलेंगे

अगर मिल सके न
          हम इस जहां में
मेरे हमसफर तुम
          कभी गम न करना।

हों दुश्वार राहें
          भले चाहे जितनी
आंखों के मोती
          कभी मत लुटाना।

राहों पर शोले
          या कांटे बिछे हों
इन राहों से आखें
          कभी मत चुराना।

मन में लिए
        आरजू फिर मिलन की
मेरे हमसफर बस
         दुआएं तू करना।

जनम दस जनम
          हैं न्यौछावर मिलन पर
नहीं हमको फूलों
          का सपना सजाना।

ये माना कई जन्म
          ''उसके'' लिए फिर
हैं आखों की पलकों
          का पल में झुकाना।

कि ऐसा भी पत्थर
           नहीं वो खुदा भी
मोहब्बत की हस्ती
            जो चाहे मिटाना।

हम तुम मिलेंगे
             ये वादा रहा
याद बीते दिनों की
              'प्रिये' मत भुलाना॥